बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा- महाराष्ट्र में ‘बुलडोजर संस्कृति’ को बढ़ावा न दिया जाए, यह यूपी या बिहार नहीं है

 

बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने सोमवार को छत्रपति संभाजीनगर नगर निगम (CSMC) की कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि महाराष्ट्र में ‘बुलडोजर संस्कृति’ को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की, ‘यह यूपी या बिहार नहीं है।’

जस्टिस सिद्धेश्वर थोंबरे की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच AIMIM पार्षद मतीन पटेल और निवासी हनीफ खान की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने कहा कि निगम ने संबंधित संपत्तियों को मनमाने तरीके से गिराया और इस दौरान सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया। कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि मकान तोड़ने से पहले प्रभावित पक्षों को अनिवार्य 15 दिन का नोटिस तक नहीं दिया।

अदालत ने कहा, घर बनाना आसान नहीं होता। हर व्यक्ति आपकी-हमारी तरह घर बनाने का खर्च नहीं उठा सकता। बेंच ने यह भी सवाल उठाया कि नगर निगम ने पूरी इमारत गिराने से पहले कथित अवैध हिस्सों की स्पष्ट पहचान क्यों नहीं की।

अदालत ने कहा कि अधिकारियों को पहले यह तय करना चाहिए था कि भवन का कौन-सा हिस्सा अवैध है। मामले की अगली सुनवाई 15 जून को निर्धारित की गई है।

सुनवाई के दौरान CSMC की ओर से पेश सहायक सरकारी वकील संभाजी टोपे ने दलील दी कि इमारतें पहले ही ध्वस्त की जा चुकी हैं, इसलिए याचिकाएं अब निरर्थक हो चुकी हैं। उन्होंने याचिकाकर्ताओं को निचली अदालत में दीवानी राहत लेने का सुझाव दिया।

गौरतलब है कि नगर निगम ने 13 मई को AIMIM पार्षद मतीन पटेल के आवास और कार्यालय पर बुलडोजर कार्रवाई की थी। इसके साथ ही एक अन्य मकान को भी गिराया गया, जिसका इस्तेमाल कथित तौर पर एक TCS कर्मचारी कर रहा था, जो एक आपराधिक मामले में गिरफ्तारी से बच रहा था। इस कार्रवाई के बाद राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया।

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